तेरे इश्क़ की इन्तेहा चाहता हूँ मेरी
सादगी देख, क्या चाहता हूँ
सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी
कोई बात सब्र-आजमा चाहता हूँ
यह जन्नत मुबारक रहे जाहिदों को
कि मैं आपका सामना चाहता हूँ
सारा सा तो दिल हूँ मगर शोख
इतनावही लनतरानी सुना चाहता हूँ
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए अहल-ए-महफिल चिराग-ए-सहर हूँ,बुझा चाहता हूँ
भरी बज़्म में राज़ की बात कह
दी बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ
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इन्तेहां-ए-इश्क़
@ Friday, 24. Aug, 2007 – 03:53:14 pm
